उधेड़बुन -१: दीये और दीपावली
उधेड़बुन -१: दीये और दीपावली
सुबह सुबह जब सोकर उठा तो सोचा थोड़ा घर से बाहर निकलूं| बाहर देखा कि कुछ काम आय वाले निवासी फूलों का ठेला लगा रहे थे| यह उनका दैनिक ब्यवसाय नहीं है, पर उन लोगों ने सोचा होगा कि दीपावली का त्यौहार है, चंद फूलों के बदले कुछ पैसे अर्जित कर लेंगे| मैंने अपनी कल्पना को थोड़ा अनिरुद्ध कर दिया, सोचने लगा कि इन फूलों को खरीदेगा कौन? शायद मैं, शायद आप, शायद आप और हमारे जैसे कुछ और लोग| हम और आप इन फूलो से अपना घर सजायेंगे, दीपावली पर अपने देवी देवताओं का आव्हान करेंगे, प्रसन्न करेंगे और शायद पङोसियों से एक सांकेतिक प्रतिद्वंदिता भी करेंगे| ये फूलवाले ऐसा कुछ नहीं करेंगे, अगर फुल बिक गए और कुछ मुनाफा हुआ तो शायद कुछ तेल, घी, शक्कर खरीदेंगे| जब हम कृतिम रोशनी से घर जगमगाएंगे, जब हम अपनी और दूसरे की आतिशबाजियों का अवलोकन करेंगे तो शायद ये हर दिन से अलग कुछ प्रसाद ग्रहण कर तृप्ति का अनुभव करेंगे| मैं ये तो नहीं कहता कि किसकी ख़ुशी जयादा होगी, वो खुद आत्मचिंतन का विषय है , पर ये अवश्य कहूंगा की मुझे एक असमानता का एहसास होता है, और आज भी हुआ |
अब मस्तिष्क इस असमानता का कारण खोजने लगा, और थोड़ा उसके समाधान के बारे में भी सोचने लगा| प्रश्न तो छोटा दिखता है पर मेरे लिए तो बहुत बड़ा था, चिंतनीय था| समाधान सोच पाऊँगा ऐसी कल्पना तो प्रारम्भ से ही नहीं थी , हाँ एक कोशिश जरूर करना चाहता था, अतः आगे बढ़ा |
मै स्वयं एक निम्न आय परिवार से आता हूँ, मौसम के सारे रंग देखें है, शायद उष्णता थोड़ी ज्यादा ही थी और लंबी भी थी इसलिए थोड़े पुराने और ज़िद्दी हो चुके कारक भी है, जो रह रह कर अपनी उपश्थिति का एहसास कराते है| पर अगर मेरा कभी उनसे सम्बाद हो पाता तो शायद मैं उनसे यही कहता की आप तो मेरी सुनहरी यादो के धरोहर हो, मैं तो स्वयं आपको याद कर अंतर्मन में प्रसन्न हो लेता हूँ, आपके शिवाय और कोई प्रसन्नता भी तो नहीं मिली| आपको अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की ब्यर्थ परिश्रम की आवश्यकता नहीं है, आप ही तो सुब कुछ हो| मैं आपको स्वयं ही साथ रखता हूँ| जैसे रेगिस्तान में पानी की बूँद प्रसन्नता देती है, जैसे डूबते को तिनके का सहारा प्रसनता देती है, जैसे भूखे को सुखी रोटी प्रसन्नता देती है, वैसे ही मेरी अति सूक्ष्म, अति लघु उपलब्धिया मुझे प्रसन्नता देती है| खुशियों का आकार इसपर नहीं निर्भर करता है कि वो कितनी बड़ी हैं, बल्कि इसपर निर्भर करता है की जरूरत कितनी बड़ी थी| जो पानी
की बूँद रेगिस्तान में प्रसन्नता का कारण बनती है, वो ही पानी बाढ़ की मात्रा में त्रासदी बन जाती है| विचित्र किन्तु सत्य है कि हम असीमित संसाधनो की कोशिश में जीवन पर्यन्त कोशिश करते हैं, पर मिडास जैसी कहानियों से कुछ सबक नहीं लेना चाहते| शायद असमानता का एक यह भी बड़ा कारण है | अपनी बात उठाने का सिर्फ ये आशय था कि परिस्थितियों से भिज्ञ हूँ, हर अनुभव से गुज़रा हूँ, इसलिए इस विषय पर सोचने की एक छोटी कोशिश कर सकता हूँ |
पहले कारण पता लगे तभी तो समाधान की कोशिश संभव है| कारण पता लगाने में ही त्रुटि हुई तो समाधान सोचना भी ब्यर्थ होगा| सोचना शुरू किया कि असमानता का कारण क्या है। शायद शिक्षा का आभाव, शायद गरीबी, शायद कोई और लाचारी| तो क्या इसका समाधान आसान नहीं है? अशिक्षित को विद्यालय पहुचाएं, गरीब को थोड़े पैसे दें, दुखियारी कि मदद कर दें| पर किस किस की और क्यों? जब दो बच्चे विद्यालय में प्रवेश लेते हैं, एक खूब मन लगाकर पढ़ता है, दिन को दिन नहीं, रात को रात भी नहीं समझता है, क्या इसीलिए की वो उसी के समान हो, जो कभी विद्यालय ठीक से नहीं गया? कभी ठीक से पढाई नहीं की? हमेशा मौज मस्ती में लगा रहा? एक आदमी ने बहुत मेहनत की, सारी जिम्मेदारियां भी उठाई, अपनी जरूरतो को सीमीत रखा, क्या उसको उसी के बराबर होना चाहिए जिसने कभी मेहनत नहीं की? कभी सही काम नहीं किये? जब एक ब्यक्ति चोरी करता है, और कई तरह के गलत काम करता है तो उसको सजा मिलती है, साथ ही उसके आश्रितों को भी सजा मिल जाती है, ऐसे में समानता कैसे आएगी? एक आदमी एक छोटा सा घर बनाने के लिए सारी जीवन-पूँजी लगा देता है, तो क्या समानता के लिए दूसरे को मुफ्त घर दे दिए जाय? उनकी नियम विरुद्ध सम्पति को सही करार दे दिया जाय? सही व्यक्ति की संशाधन का हिस्सा जबरन उस लाचार ब्यक्ति को दे दिया जाय? क्या इससे समानता आएगी? अगर ये लगता है की ये एक पक्ष के लिए अवश्यक है तो ये भी सोचना पड़ेगा की इससे सही, मेहनती और कर्तब्यशील को क्या सन्देश जाता है? आने वाली पीढ़ी को क्या सबक देंगे? कैसे समझायेंगे की मेहनत और ईमानदारी अति अनिवार्य है? और क्या ये समानता सही है? नैतिक है? इससे प्राकृतिक नियमो का उल्लंघन नहीं होता? जानता हूँ, इसके दो पक्ष है, दोनों के अपने तर्क भी होंगे? मैं किसी एक तर्क का पक्ष या दूसरे का खंडन नहीं करता| मैं बस ये कहता हूँ की प्रश्न इतना आसान नहीं है और इसका उत्तर तो ये कदापि नहीं हो सकता है ! सही उत्तर खोजने के लिए समस्या के तह में जाना बहुत आवश्यक है| इसके मूल कारण क्या है? हमको हर बार और बार बार ये कोशिश करनी होगी कि हर गरीब लाचार जरूरतमंद की मदद हो पर मदद की पहल वो स्वयं करे| उसे जब भी लगे की शिक्षा से उसकी मदद हो सकती है तो शिक्षा का अवशर हो, अगर उसको लगे के मेहनत से उसकी मदद हो सकती है तो उसको व्यवसाय का अवशर हो| कुछ इसी तरह समस्या और लाचारी के मूल जड़ों को समझना और उनका उसी तरह समाधान ढूंढना पड़ेगा| अन्यथा गलत ब्यक्ति इसको अपना हक़ समझने लगेगा और सही ब्यक्ति की प्रेरणा कमज़ोर पड़ जायेगी| ऐसा होने पर हम आगे की बजाय पीछे की ओर जाने लगेंगे| अभी के लिए इतना तो समझ आता है की पहला कदम गलत सोच के प्रसार को रोकना जरूरी है| ठीक उसी तरह जैसे एक चिकित्षक किसी बीमारी के इलाज़ में करता है| बीमारी ठहरे तो उपचार की उम्मीद भी जगे|
सोच ने दिशा बदली| सोचने लगा कि जीवन रंगो की तरह है| जीवन में नौ भाव होते है, और रंग सात तरह के होते है| सारे एक साथ हो तो दिखाई नहीं देते (सफ़ेद) और कोई रंग ना हो (काला) तो कुछ दिखाई नहीं देता| हर रंग का अपना भाव भी होता जैसे हरा खुशहाली का भाव लाता है तो लाल बहादुरी का| सबके मिल जाने पर सफ़ेद बनता है, जो सबसे अच्छे भाव का लगता है मुझे| सफ़ेद रंग का भाव है - शांति! कितना बिचित्र सा संयोग है| सबके मिलने से शांति का भाव बनता है| जितना शांत भाव है, उसको पाना उतना ही कठिन| यक्ष प्रश्न सदियों से यही है कि सबको मिलाये कैसे| सूरज तो देवता हैं| रंगो को आसानी से मिला लेते हैं| इन्शान कर नहीं पाता या यूँ कहूँ की कोशिश भी नही करता| इन्शान ने हर रंग के लाइट बना लिए पर सूर्य के प्रकाश का लाइट आज भी नहीं बना सका है| तुलसी दास जी भी यही लिखते है "जहाँ सुमति तहा सम्पति नाना", पर सुमति तो एक कल्पना ही लगती है मुझे| मेरी क्षमता में नहीं है तो क्या हुआ, समाधान कि कल्पना तो अवश्य है| इसीलिए तो तुलसी दास जी ने लिखा। उनको लगा कि आम इन्शान भले ही इसको मुश्किल समझे पर एक खाश इन्शान के लिए तो संभव होगा। इसलिए सोचता हूँ, शायद ये भी एक समाधान हो सकता है कि सुमति कि कोशिश करें। पूरा नहीं तो थोड़ा सुधार तो अवश्य आएगा।
सोचता जा रहा था, थोड़ी उम्मीद तो दिखी पर बहुत कुछ और स्पष्ट होने लगा है| बिल्कुल एक समुद्री हिमशैल की तरह| जितना छोटा ऊपर है, उससे कही ज्यादा विशाल नीचे है| समझ में आया कि जिसको पहले से ही मुश्किल मान रहा था वो तो संभव जैसा है| थोड़ा ज़िद्दी भी हूँ तो हार भी नहीं मानूंगा, बस कुछ नए प्रश्न है, जिनका उत्तर खोजना है| उम्मीद है, मंज़िल मिलेगी| ज़िन्दगी की रेलगाड़ी है, मंज़िल पर पहुँचने का उद्देश्य है| रेलगाड़ी में कोई आशियाना तो नहीं बनाता| मुसाफिरों की तरह ही सोच बनानी ही पड़ेगी| और कोई मार्ग नहीं है, ढूंढना भी नहीं है, बस मंजिल को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना है| बढ़ते ही जाना है| अगर हो सका तो कुछ उत्तर जरूर ढूंढ जाऊंगा, उसकी कोशिश अनवरत चलती रहेगी| समर्थ नहीं हूँ, पर सोचता तो हूँ| कुछ कर पाया या नहीं, करने कि कोशिश तो करता हूँ| इस उम्मीद में कोशिश करता रहूंगा कि सफलता मिलेगी, पूरी नहीं तो आंशिक ही सही|
फिर आऊंगा अपने बढ़ाते विचारो के साथ|| दीये और दीपावली का मेरी सोच से गहरा सम्बन्ध है| ये समाधान की प्रेरणा देता है| खंड-२ में लिख रहा हूँ, पढियेगा||
दीपावली की शुभ कामनाएं ! भगवान् करे सबको वो सब मिले जो वो चाहता है!!!

Comments
Post a Comment