दीपावली: दिए की लौ, बदलता मौसम और सदियों पुराना शुद्धि-विधान
दीपावली, जिसे "रोशनी का त्योहार" कहा जाता है, केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारे प्राचीन ज्ञान और प्राकृतिक चक्रों के साथ हमारे गहरे संबंध का भी प्रतीक है। दिए की लौ, बदलता मौसम और इसके पीछे का वैज्ञानिक शुद्धि-विधान – ये सभी दीपावली को एक अनूठा और स्वास्थ्यप्रद त्योहार बनाते हैं। आइए जानते हैं कैसे: 1. बदलते मौसम का संदेश: शरद ऋतु से शीत ऋतु की ओर दीपावली का त्योहार आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में आता है, जो शरद ऋतु के अंत और शीत ऋतु के आगमन का समय होता है। यह मौसम परिवर्तन कई मायनों में महत्वपूर्ण है: तापमान में गिरावट: दिन और रात के तापमान में अंतर बढ़ने लगता है। कीट-पतंगों का प्रकोप: इस समय वातावरण में मच्छर, मक्खी और अन्य सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या बढ़ने लगती है। नमी और बदलते तापमान के कारण ये जीवाणु विभिन्न बीमारियों (जैसे मलेरिया, डेंगू, फ्लू) को फैलाने में सहायक होते हैं। फसलों की कटाई: यह खरीफ फसलों की कटाई का समय भी होता है, जिससे अनाज के भंडारण और उससे जुड़े कीटों का खतरा बढ़ जाता है। इन मौसमी बदलावों को हमारे पूर्वजों ने हजारों साल पहले ही समझ लिया...