उधेड़बुन -२: दीये और दीपावली

उधेड़बुन -२: दीये और दीपावली





प्रकृति का विधान है। सुबह होती है, तो शाम भी होती है। दिन होता है तो रात भी होती है। मेरी सोच ने भी करवट ली। सुबह की दिनचर्या और दिन के प्रकाश के पश्चात शाम और रात की बारी आयी। आदिकाल से मानव अँधेरे से बचने की कोशिश करता रहा है। वो शायद कल्पना भी नहीं करना चाहता कि यदि अँधेरा इतना ही गैरजरूरी होता तो प्रकृति इसका निर्माण ही क्यों करती। जिस प्रकृति के रहस्यों को आजतक हम समझ नहीं पाए। जिसके ज्ञान के आग विज्ञान हमेशा ही नतमस्तक होता रहा है, वो प्रकृति क्या इतनी स्पष्ट भूल कर सकती है? इस विषय पर मेरी सोच थोड़ी भिन्न है। मैं अंधकार को भी प्रकाश कि ही तरह अत्यंत आवश्यक समझता हूँ। चूँकि ये प्राकृतिक भी है, मेरी सोच थोड़ी दृढ हो जाती है। बहुत सारे कार्य अंधकार के अधीन है। निद्रा उसमे प्रथम स्थान पर आती है। कुछ जीवों के लिए तो अंधकार उसी तरह जीवनदायिनी है जैसे हमारे लिए प्रकाश। और शायद इसीलिए मैंने सोच को आगे बढ़ाया और अंधकार से भी निराकरण कि उम्मीद लगा बैठा।

दीपावली का त्यौहार है। आजकल तो हर तरफ कृतिम बैद्युतिकीय रोशनी दिखाई देती है। दिए तो अतीत कि धरोहर बनाते जा रहे है। जब आदिकाल से जीवंत दियो के बारे में सोचता हूँ तो बरबस एक ख्याल आ जाता है। यकीन हो उठता है कि आजकल के बैद्युतिकीय दिए ज्यादा श्रेष्ठ है। एक बार ले लिया तो कई बार कि छुट्टी। न जलाने का झंझट न तेल भरने और ख़तम होने कि चिंता। ये भी लगता है कि ये प्रकृति के ज्यादा नजदीक है। प्रदूषण भी नहीं फैलाते। मन प्रसन्न हो ही रहा था कि दीये का ख़याल आया। क्या वो बैद्युतिकीय रोशनी कि तुलना में निम्न कोटि का है? क्या यह उसकी कमजोरी है कि वो घी-तेल और बाती के साथ जलते हुए अपना अश्तित्व ही मिटा देता है? ये तो सामान्य नहीं लगा? स्वयं को परमार्थ के लिए मिटा देना कमजोरी तो नहीं हो सकता। ये तो अच्छे अच्छे और अपने को बहुत महान समझने और कहने वालों के वश में भी नहीं होता। तो फिर दीये के खुद को मिटा देने के पीछा वास्तविकता क्या है? कौतुहल जागता है तो आगे सोचना स्वाभाविक हो जाता है।

बहुत परिश्रम नहीं करना पड़ा। दीये कि वास्तविकता तो बिल्कुल अलग दिखाई देने लगी। सदियों से दीये की महत्ता विद्यमान है, इसका अनगिनत और अति-विशिष्ट कारण भी है। सर्वप्रथम तो ये कि दिया हमको अँधेरे में प्रकाश देता है, पर ये भी अविश्वनीय है कि चाहे अँधेरा कितना ही गहरा क्यों ना हो, दीये के आत्मविश्वाश को बिल्कुल अस्थिर नही कर पाता है। इसका ये अभिप्राय हुआ कि दीया अति साहसी है, और हमे साहस की शक्ति दिखाता है। आज के प्रसंग के सन्दर्भ में, सबसे महत्त्वपूर्ण यह गुण दिखता है कि दीया ये भलीभांति जानता है, रात का अंधकार अति विशाल है, उसको पराजित करने के लिए सूर्य जैसे बलवान कि प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, फिर भी वो अपना कर्तव्य निभाता है।  थोड़ी दूर का ही सही, थोड़े कम तीव्रता से ही सही, अंधकार को भगा देता है। उसको इससे प्रभाव नही पड़ता कि कितना अंधकार दूर हुआ, कितना ज्यादा अभी भी बच गया, पर इस बात का सुख और संतोष होता है, उसके आस पास का अँधेरा कम हुआ। कुछ लोगो का ही सही, भला तो हुआ। निश्चित ही ये एक सकारात्मक सोच है। समाज में कितनी ही विसंगतिया क्यों ना हो, हमारे अपने में कितना ही कम सामर्थ्य क्यों ना हो, हमे ये कोशिश करनी पड़ेगी कि हम जितना भी कर सकते हो, समाजसेवा में हमारा एक स्वैक्षिक योगदान हो। और साथ में ये भी ध्यान रखना होगा कि ये योगदान प्राकृतिक नियमो के अनुरूप हो, विरुद्ध नही।

वैसे तो दीये के अशंख्य गुण है, पर सबसे बड़ा है, उसका त्याग। दूसरो को प्रकाश मिले, वातावरण में शुद्धि आये, कीटाणु रुपी अवराधको के विनाश के लिए, और ना जाने कितने लक्ष्यों कि प्राप्ति के लिए, वो स्वयं का महान वलिदान दे देता है। उसको अपनी उपस्थिति से ज्यादा जीवन का उद्देश्य प्यारा होता है, और उसी के लिए अपना सर्वस्व न्योवछवर कर देता है। आगे मै ये कहूँ कि हमें भी यही करना चाहिए तो ये कुछ व्यावहारिक नही होगा। इतना कर पर पाना हमारे वश में नही। मेरा ये आशय कदापि नही है कि ऐसा संभव नही है, परन्तु ये हम जैसे साधारण मनुष्यों के वश की बात नही। ऐसा कर पाने वाला एक दैव पुरुष यो यूँ कहूँ तो युगपुरुष ही होता है। हमारे वेद, पुराण, साहित्य और आधुनिक इतिहास ऐसे अशंख्य वलिदानी महापुरषों के गौरव गाथा से भरा पड़ा है। चाहे प्रसंग महर्षि दधीचि का हो, चाहे वीर हमीद का, हमारे ऐतहासिक गणमान्य महामानवों ने हमें समय समय पर इसका स्मरण कराया है। मुझे तो गर्व होता है कि हम ऐसे देवभूमि पर जन्म लिए, जहा त्याग, तपश्या, और परोपकार कण कण में विराजमान है। कष्ट है तो बस इतना कि इसपर स्वार्थ की  एक मैली धुल चढ़ गयी है। परोपकार का दिखावा कर, अपना ही हित साधने में हर कोई लगा है। पर अभी भी कुछ लोग इसका अपवाद बन, अपना सर्वश्व समाज हित में अर्पण किये जा रहे है। मैं ऐसे सभी महापुरुषो का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ।

दीये के साथ थोड़ा दीपवाली का समरण भी अनिवार्य हो जाता है। दीपावली का मुहूर्त काल मुझे सर्वाधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। वर्षा ऋतू समाप्त हो रही है, शरद ऋतू का आगमन हो रहा है। वातावरण में, जल-जमाव और नमी के कारण तरह तरह के कीटाणुओं कि उपश्थिति है, ऐसे में दीपावली एक छिपे उद्देश्य के साथ आता है।  दीपावली के पर्व पर सहस्रो दिए अपना वलिदान देकर वातावरण को कीटाणुरहित और शुद्ध करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।  समाधान के कोशिश के साथ साथ उसका समय भी अति-महत्वपूर्ण होता है, इसका भी ध्यान रखना चाहिए।और यहाँ पर ये समझाना सहज हो जाता है, अनमने कर्त्तव्य और सुरक्षित मनोभाव के साथ जलते हुए विद्युतिकीय प्रकाश स्रोत हमें विपरीत दिशा में ले जाते है। कुछ ऐसा ही प्रयत्न हम आज के समाज में देख रहे है। ये उपयोगी कम, नुकशानदेह ज्यादा है। समाज कि विसंगतियों को दूर करने के लिए हम सबको अपने सामर्थ्य के अनुसार स्वेक्षा से से सहयोग तो करना ही होगा, पर साथ में प्राकृतिक मूल्यों का ध्यान भी रखना पड़ेगा। अन्यथा आनेवाली पीढ़ियों पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। दीये और दीपवाली के सहारे कुछ उत्तर ढूंढने का छोटा प्रयत्न किया, अभी बहुत प्रश्नो के उत्तर बाकी है। अपने प्रयत्न करने पर थोड़ी तृप्ति भी है, और आगे सोचने का उत्साह भी है। 

समय और मष्तिस्क के गाड़ी बिना रुके अनवरत चलती चली जा रही है।  फिर कोई सांकेतिक थनहराव आया तो विचार व्यक्त करूंगा। अभी के लिए आपका धन्यबाद!!

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