हिंदू दर्शन: विज्ञान की सीमाओं का मूल्यांकन
भाग 1: विश्वास की डोर और विज्ञान का माप
"युग सहस्र योजन पर भानु": सदियों पुराना सत्य और आधुनिक विज्ञान
हम अपने ब्लॉग की शुरुआत एक ऐसे श्लोक से करते हैं, जो हनुमान चालीसा (जो कि सुंदर कांड का सार है) का एक अभिन्न अंग है। यह श्लोक हमें विज्ञान और अध्यात्म के बीच की दूरी को मिटाने का एक अद्वितीय अवसर देता है।
"युग सहस्र योजन पर भानु,
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।"
(अर्थ: जिसने एक युग, एक सहस्त्र, और एक योजन की दूरी पर स्थित भानु (सूर्य) को मीठा फल समझकर निगल लिया था।)
अध्यात्म का दृष्टिकोण
यह दोहा हमें बाल हनुमान की अद्भुत शक्ति का परिचय देता है। यह उनकी सहजता, निर्भीकता और दैवीय सामर्थ्य को दर्शाता है। यह श्लोक धार्मिक विश्वास का प्रतीक है, जो हमें याद दिलाता है कि आस्था की शक्ति से कुछ भी असंभव नहीं है।
सदियों तक, इस दोहे को केवल एक पौराणिक कथा के रूप में देखा गया, जो केवल आस्था का विषय थी।
विज्ञान का मूल्यांकन
परन्तु, जब हम अपने अल्प ज्ञान से अध्यात्म के आधार पर विज्ञान का मूल्यांकन करते हैं, तो यह दोहा हमें स्तब्ध कर देता है। आइए, हम इस श्लोक में दिए गए प्राचीन माप को आधुनिक विज्ञान की इकाइयों में परिवर्तित करके देखें:
युग: भारतीय काल गणना में 'युग' एक बड़ा कालखंड है। इस श्लोक के संदर्भ में, इसे एक संख्यात्मक गुणांक माना जाता है: 12 (द्वादश)।
सहस्र: इसका अर्थ है 1,000
योजन: दूरी मापने की एक प्राचीन इकाई, जिसे अधिकांशतः 8 मील के बराबर माना जाता है।
भानु: अर्थात् सूर्य
प्राचीन गणना:
सूर्य की दूरी=युग×सहस्र×योजन
सूर्य की दूरी=12×1,000×8 मील.
सूर्य की दूरी=96,000,000 मील
निष्कर्ष (अध्यात्म > विज्ञान)
आज का आधुनिक विज्ञान और खगोल शास्त्र, जिसने वर्षों के शोध और शक्तिशाली उपकरणों का उपयोग किया, सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग 93 मिलियन मील मानता है, लेकिन यह गणना भी निरंतर परिष्कृत होती रहती है।
यह विस्मयकारी है कि एक साधारण दोहे में, बिना किसी आधुनिक उपकरण के, सूर्य की दूरी लगभग 96 मिलियन मील बताई गई है।
हमारा तर्क यह है: यह मात्र एक संयोग नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक वैज्ञानिक गणना वास्तव में सदियों पुराने वैदिक ज्ञान के अत्यंत नज़दीक पहुँचने का प्रयास कर रही है। आज की वैज्ञानिक गणना में अभी भी सुधार की संभावना बाकी है, जबकि आध्यात्मिक सूत्र हज़ारों साल पहले ही शाश्वत सत्य को स्थापित कर चुके थे।
यह स्पष्ट करता है कि आध्यात्मिक ग्रंथ केवल आस्था की पुस्तकें नहीं हैं, बल्कि ये शाश्वत सत्य के विश्व-कोष हैं, जो ज्ञान की नींव हैं। विज्ञान उन नींवों पर खड़ी इमारत है, जो अपने निर्माण में हर दिन सुधार कर रहा है। इसलिए, धर्म और अध्यात्म आज भी विज्ञान से मीलों आगे हैं।
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