सिर दक्षिण में (जीवित) और उत्तर में (मृत): दिशा और ऊर्जा का विज्ञान
भाग 7: "पृथ्वी का चुम्बकत्व और चेतना: सोने की दिशा बताने वाला प्राचीन विज्ञान"
हमने देखा कि हमारी परंपराओं में जीवनशैली से जुड़े हर नियम के पीछे एक वैज्ञानिक सत्य छिपा है। ऐसा ही एक नियम है: जीवित रहते समय सिर दक्षिण दिशा की ओर करके सोना और इसके विपरीत, मृत शरीर को अंतिम संस्कार से पहले सिर उत्तर दिशा में रखना।
यह नियम केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Earth's Magnetic Field) और मानव शरीर की ऊर्जा के गहन ज्ञान पर आधारित है।
1. जीवित अवस्था में सिर दक्षिण में: ऊर्जा का सामंजस्य (Energy Harmony)
भौतिक विज्ञान: हमारी पृथ्वी एक विशाल चुंबक की तरह कार्य करती है, जिसका उत्तरी ध्रुव (North Pole) और दक्षिणी ध्रुव (South Pole) है। मानव शरीर भी अपने आप में एक छोटा चुंबक है, जिसका सिर उत्तर ध्रुव और पैर दक्षिणी ध्रुव की तरह काम करता है।
अध्यात्मिक/स्वास्थ्य विज्ञान:
जब हम सिर दक्षिण की ओर करके सोते हैं, तो हमारे शरीर का उत्तरी ध्रुव (सिर) पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव की ओर आकर्षित होता है। विपरीत ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। यह खिंचाव हमारे रक्त परिसंचरण (Blood Circulation) को स्थिर और सुचारु बनाता है।
इससे रक्तचाप (Blood Pressure) नियंत्रित रहता है और मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह संतुलित रहता है, जिससे गहरी और शांतिपूर्ण नींद आती है। यह हमारे 'प्राण' (जीवन ऊर्जा) को संतुलित रखता है।
सिर उत्तर की ओर सोने का निषेध: यदि हम सिर उत्तर की ओर करके सोते हैं, तो हमारे शरीर का उत्तरी ध्रुव (सिर) और पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव एक दूसरे को प्रतिकर्षित (Repel) करते हैं। इससे मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह अनियंत्रित हो सकता है, जिससे तनाव, अनिद्रा, और सिरदर्द हो सकता है।
2. मृत्यु के बाद सिर उत्तर में: चेतना का विसर्जन (Consciousness Dissolution)
अध्यात्मिक उद्देश्य: मृत्यु के बाद, आत्मा या चेतना शरीर से बाहर निकलने लगती है। इस प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए शरीर को इस प्रकार रखा जाता है कि वह पृथ्वी के सबसे बड़े चुंबकीय खिंचाव (उत्तरी ध्रुव) के साथ संरेखित हो जाए।
ऊर्जा विसर्जन: मृत शरीर का सिर उत्तर में रखने से, पृथ्वी का उत्तरी चुंबकीय ध्रुव शरीर के उत्तरी ध्रुव (सिर) के साथ संरेखित होता है। चूँकि समान ध्रुव एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं, यह संरेखण शरीर से बची हुई जीवन ऊर्जा या चेतना के सूक्ष्म अंशों को तेजी से बाहर निकालने में मदद करता है। यह माना जाता है कि यह आत्मा की अंतिम यात्रा (Final Journey) को सरल बनाता है।
निष्कर्ष: विज्ञान से पहले का पर्यावरण नियम
यह नियम स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि हमारे वैदिक ऋषियों को भू-चुम्बकत्व (Geo-Magnetism) और मानव शरीर विज्ञान के बीच के गहरे संबंध का सटीक ज्ञान था।
जहाँ आधुनिक विज्ञान को नींद की गुणवत्ता या स्वास्थ्य पर चुंबकीय क्षेत्र के प्रभावों को सिद्ध करने के लिए जटिल इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफी (EEG) और प्रयोगों की आवश्यकता होती है, वहीं अध्यात्म ने हजारों साल पहले ही जीवन जीने का एक सरल, ऊर्जा-आधारित नियम बना दिया था।
यह एक बार फिर सिद्ध करता है कि अध्यात्म का ज्ञान पृथ्वी के मौलिक नियमों पर आधारित है, और यह ज्ञान आधुनिक भौतिकी और शरीर विज्ञान से मीलों आगे है।
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