न्यूटन से सदियों पहले का विज्ञान: हनुमान जी और गति का तीसरा नियम

 आज का विषय एक ऐसी चौपाई पर केंद्रित है जो भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथों की वैज्ञानिक गहराई को सिद्ध करती है।

बात हो रही है गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड की इस चौपाई की:

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥



 

चौपाई का सीधा अर्थ

इस चौपाई का सरल अर्थ यह है कि: "जिस पर्वत पर हनुमान जी ने अपने चरणों से बल दिया (अर्थात जिस पर से वे छलांग लगाने के लिए उछले), वह पर्वत तुरंत ही पाताल में धंस गया।"

यह वर्णन उस क्षण का है जब हनुमान जी विशाल सागर को पार करने के लिए महेंद्र पर्वत से छलांग लगाते हैं।

विज्ञान का अद्भुत रहस्य: न्यूटन का तीसरा नियम (Newton's Third Law)

यह चौपाई, जो 17वीं शताब्दी में सर आइजैक न्यूटन द्वारा प्रतिपादित गति के तीसरे नियम (Third Law of Motion) से सदियों पहले लिखी गई थी, उसी वैज्ञानिक सिद्धांत की अद्भुत व्याख्या करती है।

न्यूटन का तीसरा नियम कहता है:

"प्रत्येक क्रिया (Action) के लिए, हमेशा एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया (Equal and Opposite Reaction) होती है।"



 

चौपाई में वैज्ञानिक सिद्धांत की व्याख्या:

  1. क्रिया (Action): हनुमान जी ने लंका की ओर उड़ने के लिए अपने असाधारण बल और वेग से महेंद्र पर्वत पर नीचे की दिशा में एक विशाल क्रिया बल लगाया।

  2. प्रतिक्रिया (Reaction): इस क्रिया के ठीक बराबर और विपरीत दिशा में, पर्वत ने हनुमान जी को ऊपर की दिशा में एक प्रतिक्रिया बल दिया। यही प्रतिक्रिया बल उन्हें आकाश में इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ने में सक्षम बनाता है।

  3. परिणाम (Effect): हनुमान जी का बल इतना भयंकर था कि पर्वत पर लगाई गई क्रिया का परिणाम यह हुआ कि पर्वत, जो पृथ्वी पर टिका था, उस बल के कारण पाताल में धंस गया

अगर न्यूटन के नियम को आज की भाषा में देखें, तो यह रॉकेट प्रक्षेपण के सिद्धांत जैसा है: रॉकेट जितनी तेजी से गैस (बल) नीचे छोड़ता है, प्रतिक्रिया बल उसे उतनी ही तेजी से ऊपर धकेलता है। हनुमान जी ने अपने पैरों से यही बल पर्वत पर लगाया।

निष्कर्ष: अध्यात्मिक ज्ञान की वैज्ञानिकता

यह चौपाई सिर्फ एक काव्य वर्णन नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथ न केवल धर्म, दर्शन और जीवन मूल्यों की बात करते थे, बल्कि उनमें भौतिकी (Physics) के गहरे सिद्धांत भी समाहित थे।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस घटना का वर्णन लगभग 16वीं शताब्दी में किया, जबकि न्यूटन ने अपने नियम 1687 ईस्वी में प्रकाशित किए। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि गति और बल (Motion and Force) के ये सिद्धांत भारतीय ज्ञान परंपरा में सदियों से ज्ञात थे।

यह हमारी परंपरा की वैज्ञानिक दूरदर्शिता को सिद्ध करता है, जो आधुनिक विज्ञान के आगमन से कहीं पहले ही ब्रह्मांड के मौलिक नियमों को समझ चुकी थी।

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