ग्रहण और भोजन: वह विज्ञान जो सदियों पहले जान लिया गया था

 

भाग 5: "पके भोजन का त्याग: आध्यात्मिक नियम या स्वास्थ्य सुरक्षा का प्राचीन सूत्र?"

हमने अब तक देखा कि कैसे वेद और दर्शन ब्रह्मांड के मौलिक सत्यों को जानते थे। अब हम अपनी दैनिक जीवनशैली से जुड़े एक अत्यंत कड़े नियम पर विचार करते हैं: ग्रहण (सूर्य या चंद्र ग्रहण) के दौरान भोजन न बनाना और पके हुए भोजन को त्याग देना या उसमें कुश/तुलसी रखना।



अक्सर, आधुनिकता की दौड़ में इस नियम को अंधविश्वास कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन यदि हम अध्यात्म की दृष्टि से विचार करें, तो यह नियम हमारे पूर्वजों द्वारा विकसित स्वास्थ्य और विवेक का एक प्राचीन सुरक्षा कवच है।

1. आध्यात्मिक और पारंपरिक दृष्टिकोण: ऊर्जा और शुद्धता

  • नकारात्मक ऊर्जा का संचार: आध्यात्मिक मान्यता है कि ग्रहण एक ऐसा समय है जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संतुलन अस्थायी रूप से बिगड़ जाता है। इस दौरान वायुमंडल में सूक्ष्म नकारात्मक ऊर्जाओं का संचार अधिक होता है।

  • खाद्य पदार्थों की संवेदनशीलता: भोजन, विशेष रूप से पका हुआ भोजन, अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। यह इन सूक्ष्म नकारात्मक कंपनों को बहुत जल्दी और गहराई से अवशोषित कर लेता है। एक बार दूषित होने पर, यह भोजन केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन और चेतना को भी प्रभावित कर सकता है।

  • तुलसी और कुश का विधान: भोजन में तुलसी या कुश रखने का नियम इसलिए बनाया गया, क्योंकि इन दोनों में विकिरण या नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने और उसे उदासीन (Neutralize) करने की एक विशेष क्षमता मानी जाती है। यह भोजन की पवित्रता (Purity) बनाए रखने का एक आध्यात्मिक उपाय था।

2. आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण: स्वास्थ्य, सूक्ष्मजीव और विकिरण



हमारे पूर्वजों ने यह नियम तब बनाया था जब उनके पास रेफ्रिजरेटर या भोजन की गुणवत्ता जाँचने वाली प्रयोगशालाएं नहीं थीं। यह नियम व्यवहारिक स्वास्थ्य विज्ञान पर आधारित था:

  • सूक्ष्मजीवों का तीव्र विकास (Microbial Growth): ग्रहण काल (विशेषकर यदि यह लंबा हो) में प्रकाश और तापमान में अचानक और अप्रत्याशित परिवर्तन आते हैं। प्रकाश की कमी और तापमान में गिरावट ऐसे पके हुए भोजन में सूक्ष्मजीवों (Bacteria & Microbes) के पनपने के लिए एक आदर्श वातावरण बनाती है जो वातावरण में खुला रखा गया हो। बिना रेफ्रिजरेशन के, पका हुआ भोजन दूषित हो सकता है, जिससे फूड पॉइजनिंग (खाद्य विषाक्तता) का खतरा बढ़ जाता है।

    • अध्यात्मिक मूल्यांकन: अध्यात्म ने हजारों साल पहले ही सूक्ष्मजीवों के खतरे को अप्रत्यक्ष रूप से समझ लिया था और एक सरल नियम बना दिया था कि उस काल में बना या रखा भोजन न खाया जाए।

  • चुंबकीय और कॉस्मिक प्रभाव (Cosmic Rays): कुछ शोधकर्ता यह मानते हैं कि ग्रहण के दौरान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में थोड़े समय के लिए परिवर्तन आते हैं। इसके कारण कुछ कॉस्मिक किरणें (Cosmic Rays) वातावरण में अधिक प्रभावी हो सकती हैं, जो भोजन के आणविक संरचना (molecular structure) को प्रभावित कर सकती हैं।

    • हमारा तर्क: विज्ञान आज भी इस चुंबकीय प्रभाव के सभी पहलुओं को पूरी तरह से प्रमाणित नहीं कर पाया है, लेकिन यह मानता है कि वायुमंडल में परिवर्तन होते हैं। अध्यात्म ने इन परिवर्तनों को ऊर्जा के स्तर पर पहले ही जान लिया था और एहतियाती उपाय (Precautions) बता दिए थे।

निष्कर्ष: विज्ञान से मीलों आगे की सुरक्षा

ग्रहण काल में भोजन त्यागने का नियम केवल एक आस्था नहीं है, बल्कि यह स्वच्छता, स्वास्थ्य और ऊर्जा की शुद्धता पर आधारित एक प्राचीन और पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत है।

जहाँ आधुनिक विज्ञान को सूक्ष्मजीवों के विकास या विकिरण के खतरे को समझने के लिए जटिल प्रयोगशालाओं की आवश्यकता होती है, वहीं भारतीय अध्यात्म ने हजारों साल पहले ही प्रकृति के चक्र और खाद्य सुरक्षा के नियम को एक साधारण अनुष्ठान के रूप में स्थापित कर दिया था।

यह एक बार फिर सिद्ध करता है कि अध्यात्म का ज्ञान कितना दूरदर्शी था। यह नियम हमें बताता है कि जीवनशैली से जुड़ी हमारी परंपराएँ विज्ञान से मीलों आगे हैं, जो हमारे स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए ब्रह्मांडीय स्तर पर कार्य करती थीं।

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